पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल,क्या आशा रानी की तरह हाईकोर्ट से जमानत मिलने की पिच तो तैयार नहीं हो रही
करनाल।
हरियाणा में धान खरीद के नाम पर हुए 1500 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में एक अहम मोड़ आया है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के निरीक्षक समीर वशिष्ठ की अग्रिम जमानत याचिका अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रजनीश कुमार ने खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले को जांच एजेंसियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही पुलिस कार्रवाई की गति और गंभीरता पर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
समीर की जमानत क्यों खारिज हुई?
जांच में सामने आया कि समीर वशिष्ठ ने—
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मंडी में फर्जी गेट पास जारी किए,
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सरकारी खरीद को कागज़ों में बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया,
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मिलों तक धान पहुंचाने के फर्जी दस्तावेज तैयार करवाए,
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और विभाग को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाई।
इन पर दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज हैं—एक सदर थाना में, जिसमें 12,659.62 क्विंटल धान की कमी मिली, और दूसरी सिटी थाना में फर्जी गेट पास और खरीद से जुड़ी धारा 318, 338, 336(3), 340(2) और 318(5) के तहत दर्ज।
अदालत ने कहा कि समीर से कस्टोडियल इंटरोगेशन जरूरी है। अग्रिम जमानत मिलने पर जांच प्रभावित हो सकती थी—इस आधार पर याचिका खारिज हुई।
समीर वशिष्ठ—पूरे नेटवर्क का ‘मुख्य जोड़’?
जांच एजेंसियों का दावा है कि समीर इस घोस्ट प्रोक्योरमेंट नेटवर्क का एक अहम हिस्सा हैं।
समीर के पास—
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फर्जी खरीद चेन,
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मिल मालिकों से मिलीभगत,
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मंडी निरीक्षकों की भूमिका,
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और फर्जी गेट पास सिस्टम
से जुड़े कई राज होने की संभावना है।
इसी वजह से पुलिस लगातार यह दावा कर रही थी कि समीर को बिना हिरासत लिए जांच आगे नहीं बढ़ सकती।
जमानत खारिज होने के तीन बड़े प्रभाव
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समीर की गिरफ्तारी लगभग तय—पुलिस को अब रिमांड में पूछताछ का पूरा अधिकार मिलेगा।
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दूसरे आरोपी दबाव में आएंगे—क्योंकि नेटवर्क का पर्दाफाश होने की उम्मीद बढ़ गई है।
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अदालत का स्पष्ट संदेश—यह साधारण गड़बड़ी नहीं, बल्कि गंभीर आर्थिक अपराध है।
लेकिन बड़ा सवाल—अब तक गिरफ्तारी क्यों नहीं?
जमानत खारिज होने से पहले तक समीर खुले आम घूम रहे थे।
एफआईआर दर्ज हुए काफी समय हो चुका है, लेकिन पुलिस ने गिरफ्तारी की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
यही ढिलाई देखकर अब यह सवाल उठ रहा है कि—
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क्या पुलिस ने जानबूझकर समीर को कोर्ट जाने का समय दिया?
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क्या जांच टीम इतनी कमजोर है कि मुख्य आरोपी गिरफ्तारी से बचते रहे?
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और क्या यह सिर्फ संयोग है कि इसी तरह मुख्य किंगपिन आशा रानी भी हाई कोर्ट से अंतरिम जमानत लेने में सफल हो गईं?
कई कानूनी विशेषज्ञों और मंडी के जानकारों का मानना है कि जांच टीम की धीमी कार्रवाई ने आरोपियों को कानूनी सुरक्षा लेने का पूरा मौका दिया।
जांच टीम का दावा—“हम सही दिशा में हैं”
जांच अधिकारी यह कहते रहे हैं कि—
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फाइलें जटिल हैं,
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दस्तावेजों की जांच चल रही है,
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और जल्द बड़ी कार्रवाई होगी।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि—
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मुख्य आरोपी बेल पर बाहर हैं,
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और जिन पर शुरुआती शक था, वे पुलिस हिरासत में आने से पहले ही सुरक्षित हो गए।
आशा रानी—पूरे घोटाले की ‘पहली कड़ी’
एडवोकेट राजेंद्र चौहान द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है कि यह घोटाला पूरी तरह सुनियोजित था।
इसमें आशा रानी की भूमिका सबसे पहले सामने आती है क्योंकि—
मंडी में पहला कदम ही गेट पास कटना होता है,
और फर्जी गेट पास ही इस घोटाले की नींव बने।
HSAMB ने आशा रानी को निलंबित तो कर दिया, लेकिन गिरफ्तारी से पहले ही उन्होंने हाई कोर्ट से राहत ले ली—यह भी पुलिस कार्रवाई पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
आगे क्या? पुलिस पर अब दबाव बढ़ा
समीर की जमानत खारिज होने के बाद अब निम्न कदम तय माने जा रहे हैं—
1. तुरंत गिरफ्तारी
पुलिस को अब कोई बहाना नहीं बचा है।
2. लंबा रिमांड
समीर से पूछताछ होने पर पूरे नेटवर्क के और नाम खुल सकते हैं।
3. उच्चस्तरीय निगरानी
संभावना है कि मामले की निगरानी अब जिला स्तर से ऊपर बढ़े।
जमानत खारिज होना सिर्फ कानूनी फैसला नहीं, घोटाले के असली खुलासे की शुरुआत है।
अब देखने वाली बात यह है कि—
क्या पुलिस तेजी दिखाती है,
या फिर यह भी कई पुराने मामलों की तरह
धीरे-धीरे कागज़ों में दब जाता है?