कांग्रेस मेयर उम्मीदवार मनोज वधवा: कितना सियासी दम दिखा पाएंगे इस बार

रेणु बाला के सामने वधवा की उम्मीदवारी, कांग्रेस के लिए जरूरी या मजबूरी

मनोज ठाकुर करनाल


सियासत में हालात और आंकड़ों की अलग ही भूमिका होती है। बीजेपी ने इस मिथ को तोड़ दिया है। अब जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं। जो होता है, वह कई बार दिखता नहीं। जब से बीजेपी सत्ता में हैं, कमोबेस सियासी अांकड़ें व हालात गौण से होते नजर आ रहे हैं।



हरियाणा की राजनीति की समझ रखने वाले अशोक यादव कहते हैं

जब इस तरह की सियासी परिस्थितियां हो, इसमें विपक्ष पर सभी की नजर टिक जाती है। खासतौर पर प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल कांग्रेस। अब कांग्रेस को प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल माना भी जाए या नहीं, यह भी सोचने की बात है। इस तरह की परिस्थितियों में कांग्रेस ने मनोज वधवा पर मेयर पद के लिए दांव लगाया है।

वह कांग्रेस जो लोकसभा के सियासी हालात को अपने पक्ष में करने से बुरी तरह से मात खा चुकी है। उनके बाहरी उम्मीदवार दिव्यांशु बुद्धिराजा बड़े बडे़ दावे करते हुए करनाल लोकसभा क्षेत्र में पहुंचे। लेकिन जैसे जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा, बुद्धिराजा व कांग्रेस की राजनीति रणनीति ताश के पत्तों की तरह ढह गई।


तब से लेकर अभी तक कांग्रेस का यह युवा नेता जिले के राजनीतिक परिदृश्य से लगभग गायब सा है।




राजनीतिक समीक्षक दीपक कुमार के अनुसार

विधानसभा चुनाव में तो ऐसा लग रहा था इस बार कांग्रेस के विधायक चुन ही जाएंगे। लेकिन चुनाव परिणाम आया तो करनाल विधानसभा सीट से सुमिता सिंह बुरी तरह से हार गई।

न सिर्फ सुमिता सिंह बल्कि कांग्रेस के सारे उम्मीदवार इस वक्त सियासी वनवास में है। वह कही नजर नहीं आ रहे हैं। इस तरह के माहौल में सीएम नायब सिंह सैनी के सामने चुनाव लड़ने वाले त्रिलोचन सिंह कुछ अलग ही भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं।



वह बीजेपी से भाईचारा निभाने की बात करते नजर आ रहे हैं। जानकार तो यहां तक बोल रहे हैं कि क्या पता, कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में भी कही भाईचारा तो नहीं निभा दिया। अब ऐसे माहौल में पहले इनेलो, फिर बीजेपी और बाद में कांग्रेस में आए मनोज वधवा को मेयर उम्मीदवार बनाना कांग्रेस के लिए जरूरी है या उनकी मजबूरी है।


क्योंकि सियासी तौर पर लगभग हाशिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस के पास मेयर चुनाव को लेकर भी फिलहाल तो कोई ठोस रणनीति नजर नहीं आ रही है। रही सही कसर पार्टी की आपसी फूट से पूरी हो रही है। मनोज वधवा ने2018 के निगम चुनाव में मेयर के लिए अपनी धर्मपत्नी आशा वधवा को खड़ा किया था।



तब उन्होंने जबरदस्त टक्कर दी थी। तत्कालीन सीमए मनोहर लाल खट्टर स्वयं बीजेपी मेयर उम्मीदवार रेणु बाला गुप्ता के लिए चुनाव प्रचार करने आए थे। आशा वधवा को कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने अपना समर्थन दिया था।


आशा वधवा काफी मजबूत उम्मीदवार नजर आ रही थी,लेकिन चुनाव परिणाम आए तो वह रेणु बाला गुप्ता से 9,348 मतों से हरा गयी थी।

करनाल मेयर की सीट महिला के लिए आरक्षित थी और आठ उम्मीदवार मैदान में थे। तब गुप्ता को 69,960 वोट मिले, जबकि आशा वाधवा को 60,612 वोट मिले। कुरुक्षेत्र के सांसद राज कुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार कोमल चंदेल 10,019 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहीं, जबकि बेअंत कौर को 7,336, तुलसी को 1,644, रानी कंबोज को 1,029, राधा रानी को 889 वोट मिले, जबकि शिक्षा मोहन को 501 वोट मिले।

तो अब सवाल यह है कि इस बार क्या 2018 से हालात अलग है। राजनीति की समझ रखने वाले यूथ फॉर चेंज के चेयरमैन वीरेंद्र भारत कहते हैं कि इस बार न तो सत्ता विरोधी लहर है। न ही विपक्ष एकजुट है। उनका कहना है कि पिछली बार आशा वधवा को पूरे विपक्ष ने समर्थन दिया था। इस बार शायद ऐसा नहीं होगा।


वीरेंद्र भारत ने बताया कि मनोज वधवा के लिए यह चैलेंज तो हैं। अब यह उन पर निर्भर करता है कि वह इस मौके को कैसे अपने पक्ष में करते हैं? क्योंकि उनके पास कांग्रेस के मजबूत नेता के तौर पर खुद को साबित करने का मौका है। बस शर्त यह है कि वह कांग्रेस में रह कर भाजपा के साथ भाईचारा न निभाए।


उन्हें एक ठोस रणनीति पर काम करते हुए सिलसिलेवार तरीके से अपनी बात को मतदाता के बीच में रखते हुए खुद को मजबूत करना होगा। कांग्रेस के स्थानीय नेता उनका साथ देंगे, ऐसा होना तो थोड़ा मुश्किल होता नजर आ रहा है। अलबत्ता उन्हें अपनी अलग सियासी पिच बनानी होगी।

जिस पर वह अच्छे से बैटिंग कर सके।

वीरेंद्र भारत का मानना है कि मनोज वधवा के पास खुद को करनाल की राजनीति में स्थापित करने का मौका है। उन्हें इसके लिए जबदस्त मेहनत करनी होगी। जिससे वह खुद को और पार्टी को मजबूत कर सके। अभी उनके पास टीम की कमी होगी,लेकिन उनका चुनाव लड़ने का अनुभव ठीक है।

उन्हें मेयर का टिकट दिया जाना कांग्रेस की मजबूरी भी है और जरूरत थी। क्योंकि उनसे बेहतर उम्मीदवार पार्टी के पास करनाल में नहीं है। इसलिए मनोज वधवा के सामने खुला मैदान है। उन्हें तय करना है कि दिव्याशु बुद्धाराजा की तरह वह लूजर बनेंगे या फिर पार्टी व खुद को मजबूती की ओर लेकर जाएंगे।



उनके पास यहां खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन पाने के लिए बहुत कुछ है। अब यह उन्हें तय करना है, किस दिशा में आगे कदम बढ़ाना है। शार्टटर्म राजनीति या लांग टर्म सियासत। धीरे धीरे खत्म हो रही कांग्रेस के िवह एक बड़ी उम्मीद भी बन सकते हैं। और भाईचारा निभाने वाले नेताओं को आइना भी दिखा सकते हैं।

लेकिन बस शर्त इतनी है, चुनाव शिद्​दत से लड़ा जाए। परिणाम भले ही कुछ भी आए।


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