नगर निगम सियासत: एक साथ आए कांग्रेसी क्या मनोज वधवा की मदद भी करेंगे?

 बीजेपी के प्रति भाई चारा न निभाए कांग्रेसी तो दे सकते हैं मेयर चुनाव में कड़ी टक्कर 

मनोज ठाकुर करनाल


नगर निगम चुनाव में नामांकन के अंतिम दिन मनोज वधवा ने मेयर पद के लिए पर्चा दाखिल कर दिया है। इस दौरान कांग्रेस के लगभग सभी दिग्गत उनके साथ रहे। नहीं रहे तो पूर्व स्पीकर कुलदीप शर्मा। उन्होंने नामांकन से दूरी बनाए रखी।

अलबत्ता कांग्रेस की ओर से लोकसभा उम्मीदवार दिव्यांशु बुद्धिराजा, पूर्व विधायक सुमिता सिंह, त्रिलोचन सिंह, इंद्री से कांग्रेस के नेता राकेश कंबोज व वीरेंद्र राठौर भी मनोज वधवा के साथ खडे़ थे।



करनाल की राजनीति की समझ रखने वाले राजनीतिक समीक्षक अशोक यादव का मानना है कि कांग्रेस की यह एक जुटता काफी समय बाद नजर आयी। ऐसा लगता है कि उन्होंने लोकसभा व विधानसभा की हार से सबक लिया है। लेकिन देखना यह होगा कि यह नेता मनोज वधवा का साथ कितना देते हैं।


क्योंकि अब कांग्रेस की स्थिति यह है कि मामला साथ खड़े होने का नहीं बल्कि टीम वर्क करते हुए मतदाता को पार्टी के साथ जोड़ने का है। इसलिए कांग्रेस के इन नेताओं को मेहनत करनी होगी।



इसलिए कहना गलत नहीं कि आने वाले एक दो दिन में पता चलेगा कि कांग्रेस की रणनीति व टीम वर्क मेयर चुनाव में कैसा रहता है।


अशोक यादव ने यह भी कहा कि ,जहां तक कुलदीप शर्मा के नामांकन के वक्त उपस्थित न होना यह दर्शा रहा है कि वह पार्टी से नाराज चल रहे हैं। यूं भी जब से यहां लोकसभा चुनाव में दिव्यांशु बुद्धिराजा आए हैं, तब से कुलदीप शर्मा खुद को पार्टी से अलग थलग किए हुए हैं। हालांकि करनाल में उनकी सियासी सक्रियता पहले भी बहुत ज्यादा नहीं रही। यादव कहते कि इसलिए उनके आने न आने का ज्यादा असर शायद ही पड़े। बस शर्त यह है कि कांग्रेस के बाकी नेता त्रिलोचन सिंह की तर्ज पर भाईचारा न निभाए।




यदि कांग्रेसी एकजुट रहते हैँ तो निश्चित ही इस बार भी मेयर चुनाव में सियासी टक्कर देखने को मिल सकती है।


मनोज वधवा ने जिस तरह से नामांकन भरते वक्त जो तेवर दिखाए हैं, वह आने वाले दिनों में और ज्यादा आक्रामक हो सकते हैं। हरियाणा की राजनीति पर शोध कर रहे प्रदीप भारद्वाज का कहना है कि कांग्रेस के लिए मेयर चुनाव एक मौका है। जिसमें वह खुद को साबित कर सकते हैं।


प्रदीप भारद्वाज का कहना है कि जहां तक नामांकन के वक्त कांग्रेसियों के एकजुट होने की बात है,यह तो लगभग हर चुनाव में ऐसा करते हैं। लेकिन यह एकजुटता सिर्फ नामांकन के वक्त तक ही रहती है।

देखना होगा कि इस बार कांग्रेसी मनोज वधवा के लिए कितना चुनाव प्रचार करते हैं।




कांग्रेसी यदि इस बार एकजुट हो जाते है तो करनाल की राजनीति में यह एक बड़ी बात होगी। बीजेपी के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस न तो खुद को संभाल पा रही है, न ही इसके नेता मतदाता को संभाल पा रहे हैं। वह खास मौकों पर साथ तो खड़े आते हैं,लेकिन पर्दे के पीछे एक दूसरे की टांग भी खींचते रहते हैं। मेयर चुनाव कांग्रेस की एक और अग्नी परीक्षा है। 





इधर बीजेपी की ओर से पूर्व मेयर रेणु बाला गुप्ता ने भी अपना नामांकन कर दिया है। इस दौरान उनके समर्थक भारी संख्या में एकजुट हुए हैं। बीजेपी ने मनोज वधवा को गैर कांग्रेसी करार दिया है।



भारद्वाज का कहना है कि इसे समझ सकते हैं कि बीजेपी मनोज वधवा को घेरने के लिए यह आरोप लगा सकती है कि कांग्रेस के पास अपना मेयर उम्मीदवार भी नहीं है। लेकिन पूर्व मेयर क्योंकि दो बार लगातार जीतती रही है। ऐसे में ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन पर जवाब मांगा जा सकता है। अब देखना यह होगा कि मनोज वधवा कितनी मजबूती से इन मुद्दों को उठाते हुए अपना चुनाव प्रचार तेज करते हैं।


कुल मिला कर यह बोला जा सकता है कि इस बार करनाल का मेयर चुनाव शह व मात का रह सकता है। इसमें कौन बाजी मारता है, यह देखने वाली बात होगी।


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