नामांकन करते ही परेशानी में फंसे मनोज वधवा, पार्टी की टूट और विवादों से पार पाना चुनौती


त्रिलोचना समेत कई कांग्रेसियों के भाजपा में जाने के मायने क्या? 

मनोज ठाकुर, करनाल 

जब से भाजपा सत्ता में आयी, कांग्रेस को लेकर एक बात अक्सर बोली जा रही है, वह बीजेपी के इशारे पर काम कर रहे हैं। 2019 के चुनाव से चली इस तरह की बातें, 2025 के चुनाव में और मजबूत हो गई। 


करनाल भी इसका अपवाद नहीं रहा। हरियाणा की राजनीति पर शोध कर रहे हरभजन सिंह सिहमांर कहते हैं, मनोहर लाल ने मार्च 2024 में जब करनाल के विधायक व सीएम पद से रिजाइन किया था,तब उपचुनाव में हुए थे। कांग्रेस से त्रिलोचन सिंह तो बीजेपी ने नायब सिंह सैनी को उम्मीदवार बनाया था। इस चुनाव में भी कांग्रेस के कुछ नेताओं पर बीजेपी की मदद करन के आरोप लगे थे। 



यह आरोप यूं ही नहीं थे। संदेह के घेरे में तो भूमिका कांग्रेस उम्मीदवार की भी रही थी। वह इतनी मजबूती से काम नहीं कर रहे थे, जितना उन्हें करना चाहिए था। यह वह पहला मौका था,जब कांग्रेस पर उंगली उठाने वालों की बातों को मजबूती मिलनी शुरू हुई। 

इसके बाद लोकसभा चुनाव में अचानक ही कांग्रेस उम्मीदवार दिव्यांशु बुद्धिराजा के चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में अचानक ही निष्क्रिय होना भी किसी ने किसी स्तर पर पार्टी की रणनीति व कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा था। 

रही सही कसर इस बार के विधानसभा चुनाव में पूरी कर  हो गई। जब एक समय ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस न सिर्फ प्रदेश में सरकार बना रही है, बल्कि करनाल की  कम से कम तीन विधानसभा सीट पर जीत रही है। 


लेकिन चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस सभी सीटों पर चारो खाने चित हो गई। तभी आरोप लगे कि कांग्रेस में जबरदस्त भीतरघात हुआ है। लेकिन वह भीतरघात करने वाले कौन है? इस ओर न तो कभी कांग्रेस आला कमान न ही कांग्रेस के चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार व सीनियर नेताओं ने कुछ बोला। 



करनाल की राजनीति की समझ रखने वाले अशोक यादव कहते हैं कि अब जिस तरह से मेयर चुनाव में कांग्रेस के त्रिलोचन सिंह और अशोक खुराना समेत कई नेता मनोज वधवा के नामांकन भरवाने के बाद बीजेपी में चले गए, वह दिखा रहा है कि पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा कितनी थी। 


अशोक यादव कहते हैं कि, यह बोलना गलत नहीं होगा कि हरियाणा में  कांग्रेस वैचारिक स्तर पर बहुत कमजोर हो चुकी है। करनाल में कांग्रेस का जो पतन हो रहा है, यह पार्टी की खत्म हो रही विचारधारा को भी दर्शा रहा है। 



यादव का मानना है कि लगातार हार के बाद भी कांग्रेस के सीनियर नेता न तो कारणों पर चिंतन कर रहे हैं न ही मंथन कर रहे हैं। करे भी कैसे? वह खुद पार्टी के भीतर ही अपने विरोधियों को ठिकाने में लगे हुए है। 


कांग्रेस हरियाणा में कई खेमों में बंटी हुई है। हुड्डा गुट मजबूत था, तो उन्होंने बाकी के गुट को ठिकाने लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, नतीजा यह रहा है कि अब वह खुद भी ठिकाने लग रहे हैं। 


अब कांग्रेस की स्थिति यह है कि कोई आए या जाए, हर कोई एक दूसरे का तमाशा ही देख रहा है। फर्क पड़ता है तो बस उसे जो चुनाव लड़ रहा है। अब क्योंकि मेयर चुनाव है, तो फर्क सिर्फ मनोज वधवा को पड़ता नजर आ रहा है। 


इसलिए न तो कांग्रेस के आलाकमान को चिंता है न ही प्रदेश की सीनियर लीडरशिप को। अशोक यादव का यह भी मानना है कि विधानसभा चुनाव की हार के बाद तो खुद हुड्डा की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। 


एेसे में वह क्या निर्णय ले सकते हैं। 

यादव का मानना है कि कांग्रेस की इस स्थिति के लिए हुड्डा बहुत हद तक जिम्मेदार है। करनाल को यदि उदाहरण मान लिया जाए तो घरौंडा, इंद्री, करनाल व असंध में हार की वजह के लिए जो गुट जिम्मेदार है, इसमें हुड्डा खेमा ही माना जाएगा। 


मनोज वधवा को छोड़ कर जाने वालों में भी त्रिलोचन सिंह हुड्डा खेमे के माने जाते रहे हैं। 

करनाल में राजनीतिशास्त्र के छात्रा दीपिका मिश्रा का कहना है कि त्रिलोचन सिंह और अशोक खुराना सिर्फ दबाव की राजनीति कर रहे थे। त्रिलोचन सिंह तो स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि उनका भाजपा के नेताओं के प्रति भाईचारा है। यानी वह कांग्रेस में रह कर बीजेपी के प्रति भाईचारा निभा रहे थे। 


दीपिका मिश्रा ने बताया कि जो त्रिलोचन सिंह करनाल में कांग्रेस का चेहरा बने हुए थे,लेकिन उनकी निष्ठा दूसरी तरफ थी। इस स्थिति में भला कांग्रेस का भला कैसे हो सकता है? 


इसलिए उनका जाना कांग्रेस के लिए ज्यादा मायने नहीं रखता। यूं भी कांग्रेस व मेयर उम्मीदवार मनोज वधवा के पास खोने के लिए तो ज्यादा कुछ नहीं है। इसलिए बेहतर यह रहेगा कि वह कितनी मजबूती से चुनाव लड़ते हैं। 


क्योंकि इससे न सिर्फ कांग्रेस बल्कि मनोज वधवा व बचे हुए कांग्रेसियों को ताे मजबूती मिलेगी ही,इसके साथ ही मतदाताओं के बीच में भी मजबूत पकड़ बना सकते हैं। 

दीपिका मिश्रा का यह भी मानना है कि कांग्रेस को अब एकजुट होकर मजबूत रणनीति बनाते हुए काम करना चाहिए। 


क्योंकि यह मुश्किल समय कांग्रेसियों के लिए खुद को साबित करने का भी है,जिसमें वह दिखा सकते हैं कि किसी के जाने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। 


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