करनाल धान घोटाला: ₹125 करोड़ के फर्जीवाड़े में 'सिस्टम हाईजैक'! क्या आशा रानी विदेश से कर रही हैं जमानत की सेटिंग?
![]() |
करनाल में 125 करोड़ की कीमत के धान के फर्जी गेट पास काटने की मुख्य करनाल मंडी की
तत्कालीन सचिव आशा रानी को पुलिस अभी तक गिरफ्तार नहीं कर पायी। बताया तो यहां
तक जा रहा है कि इस कांड में शामिल कई दलाल व दो मिल संचालक जो इस कांड में जुड़े हैं,
उन्होंने मिल कर आशा रानी को विदेश भागने में मदद की है।
इसलिए पुलिस की गिरफ्त से दूर आशा रानी विदेश में बैठ कर अपनी अंतरिम जमानत लेने
में कामयाब रही है।
जिले में सामने आए ₹125 करोड़ के कथित धान फर्जीवाड़ा और फर्जी गेट पास कांड ने न केवल सरकारी खरीद प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि कैसे कुछ प्रभावशाली लोग पूरे सिस्टम को अपने इशारों पर नचा सकते हैं। इस महाघोटाले की मुख्य आरोपित, करनाल मंडी की तत्कालीन सचिव आशा रानी, पुलिस की गिरफ्त से मीलों दूर हैं, और चर्चा है कि उन्हें विदेश भागने में मदद मिली है। विदेश में बैठकर ही वह अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं और अंतरिम जमानत पाने में सफल रही हैं।
125 करोड़ का घोटाला: गरीबों के निवाले पर डाका
यह मामला महज वित्तीय हेराफेरी या सामान्य भ्रष्टाचार से कहीं अधिक गंभीर है। मंडी सुपरवाइजर पंकज तुली (जिनका हाल ही में निधन हो गया) समेत कई लोगों पर फर्जी गेट पास काटने का आरोप है, लेकिन इस पूरे खेल की मास्टरमाइंड तत्कालीन सचिव आशा रानी को माना जाता है।
आरोप के मुख्य बिंदु:
MSP में गबन: फर्जी गेट पास के जरिए लाखों क्विंटल धान की "भूत खरीद" दिखाई गई। यह धान, या तो अस्तित्व में नहीं था, या इसे बिहार-उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों से सस्ते में लाकर हरियाणा के किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर बेचा गया। यह सीधे तौर पर किसानों के साथ विश्वासघात है, जिससे सरकारी खजाने को ₹125 करोड़ से अधिक की चपत लगी।
सरकारी फंड का गबन: फर्जी खरीद के लिए जारी किया गया सरकारी फंड सीधे दलालों, मिलरों और भ्रष्ट अधिकारियों की जेब में गया।
गरीबों के निवाले पर डाका: फर्जी गेट पास से जो धान रिकॉर्ड पर आया, उसे मिलों में भेजकर चावल तैयार किया जाना था। यह चावल अक्सर सरकारी योजनाओं, जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत गरीबों को वितरित किया जाता है। रिकॉर्ड में धान खरीदकर, उसे मिलों से गायब कर दिया गया, यानी गरीबों के हक के चावल पर भी डाका डाला गया।
अदृश्य शक्तियों की ढाल: विदेश भागने की कहानी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक ₹125 करोड़ के घोटाले की मुख्य आरोपित, मंडी सचिव आशा रानी, पुलिस की पहुँच से बाहर कैसे हैं? स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के अनुसार, इसके पीछे 'अदृश्य शक्तियों' का हाथ है।
जाँच एजेंसियों को विफल करने के लिए एक सुनियोजित रणनीति अपनाई गई, जिसमें कई दलाल और मिल संचालक शामिल थे। आशंका है कि इन लोगों ने मिलकर आशा रानी को देश से बाहर भागने में मदद की। विदेश में रहते हुए ही उन्होंने हाईकोर्ट में अपनी अंतरिम जमानत की अर्जी लगाई और उसे मंजूर कराने में कामयाब रहीं।
एक तरफ पुलिस गिरफ्तारी के लिए दबाव बना रही थी, वहीं दूसरी तरफ हाई-प्रोफाइल राजनीतिक और प्रशासनिक संपर्क उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान कर रहे थे।
सिस्टम हाईजैक: हर कदम पर मिली मदद
जाँच में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे इशारा करते हैं कि आशा रानी ने पूरे सिस्टम को 'हाईजैक' कर रखा था।
यह बात जाँच एजेंसियों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है:
यह 'हाईजैक' दर्शाता है कि आशा रानी के सियासी संपर्क और विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी उन्हें बचाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं, और अभी तक वे सफल भी होते दिख रहे हैं।
अंतरिम जमानत: बस कुछ समय की राहत
फिलहाल आशा रानी को मिली अंतरिम जमानत सिर्फ एक अस्थायी राहत है। इसका मतलब यह नहीं है कि
उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया है। गिरफ्तारी की तलवार अभी भी उन पर लटकी हुई है।
अगली चुनौती: अब पुलिस और सरकार को अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखना होगा।
अंतिम निर्णय: पुलिस को पुख्ता सबूतों के साथ यह दलील देनी होगी कि आशा रानी को हिरासत में
लेकर पूछताछ करना क्यों आवश्यक है। अदालत में रखी गई ये दलीलें ही तय करेंगी कि उन्हें नियमित
जमानत मिलेगी या पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर पाएगी।
जाँच एजेंसियों की ढिलाई पर सवाल
जाँच की वर्तमान धीमी गति पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोपितों को भगाए जाने और सबूतों को पूरी
ताकत से पेश न करने के प्रयास से ऐसा लग रहा है कि जाँच टीम
घोटाले की गंभीरता को या तो समझ नहीं रही है या जानबूझकर अनदेखा कर रही है।
यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं है। यह सीधे-सीधे है:
सिस्टम के साथ गद्दारी।
गरीबों के निवाले को हड़पना।
मनी लॉन्ड्रिंग और काले धन को बढ़ावा देना।
यदि पुलिस इन तथ्यों की ओर ध्यान देती है और आशा रानी पर सिस्टम के खिलाफ गद्दारी, मनी लॉन्ड्रिंग और गरीबों के
हक छीनने जैसी सख्त धाराएँ लगाती है, तो सजा की अवधि सात साल से कहीं अधिक बढ़ सकती है।
निष्कर्ष
करनाल धान घोटाला एक आईना है, जो यह दिखाता है कि कैसे सत्ता और पैसे के दम पर सरकारी तंत्र को पंगु बनाया जा
सकता है। एक तरफ मंडी सुपरवाइजर पंकज तुली की जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो जाती है, वहीं दूसरी तरफ
मुख्य आरोपित आशा रानी विदेश भागकर भी अपनी अंतरिम जमानत करा लेती हैं।
अब सभी की निगाहें न्यायालय पर टिकी हैं। पुलिस और सरकार की ओर से अदालत में रखे गए सबूत और दलीलें ही यह
तय करेंगी कि सिस्टम को हाईजैक करने वाली आशा रानी कानून के शिकंजे में आती हैं या फिर 'अदृश्य शक्तियाँ' उन्हें हमेशा के लिए बचा ले जाती हैं। इस केस का नतीजा बताएगा कि हरियाणा में कानून का राज चलेगा या भ्रष्टाचार का तंत्र।
