काम न आए ऊंचे संपर्क, बचाने की हर कोशिश नाकाम — मंडी सचिव आशा रानी आखिरकार कानून के शिकंजे में

करनाल

करनाल मंडी में धान खरीद से जुड़ा फर्जीवाड़ा धीरे-धीरे ऐसे खुला कि हर परत में भ्रष्टाचार आते गया। जिस गुमनाम चिट्ठी को “फर्जी” बताकर दबाने की कोशिश हुई, वही अब मंडी सचिव आशा रानी के खिलाफ एफआईआर की वजह बन गई। सियासी और विभागीय रसूख के बावजूद उन्हें आखिरकार भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 318(4) के तहत आरोपी बनाया गया है।

यह धारा धोखाधड़ी और छल-कपट से संपत्ति या मूल्यवान दस्तावेज़ हासिल करने वाले अपराधों से संबंधित है, जिसमें दोषी को सात साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।


शिकायत का आधार: मंडी सचिव ने निजी लोगों को दी जिम्मेदारी

मार्केटिंग बोर्ड के जिला अधिकारी ईश्वर सिंह राणा ने अपनी शिकायत में बताया कि आशा रानी ने गेट पास जारी करने का काम विभागीय कर्मचारियों की बजाय निजी व्यक्तियों को सौंप दिया था। जांच में पाया गया कि कई गेट पास करनाल मंडी क्षेत्र के बाहर के मोबाइल नंबरों और IP एड्रेस से जारी हुए थे।

पुलिस ने शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जिन लोगों पर मामला दर्ज हुआ है, उनमें आशा रानी के अलावा राजेंद्र, अमित और अजय शामिल हैं।


यूथ फॉर चेंज का आरोप: “ऊंचे संपर्क भी नहीं बचा पाए”

यूथ फॉर चेंज संगठन के अध्यक्ष वीरेंद्र भारत ने बताया कि जब घोटाले की चिट्ठी सामने आई, तब हर स्तर पर उसे दबाने की कोशिश हुई। विभागीय अधिकारी, राजनैतिक संपर्क और सियासी संरक्षण सबने मिलकर सचिव को बचाने का प्रयास किया, लेकिन अंततः “तथ्य” भारी पड़े।

“आशा रानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना करनाल प्रशासन की ईमानदार कार्रवाई का प्रमाण है,” वीरेंद्र ने कहा।


गुमनाम चिट्ठी से खुला मामला, जिसे पहले बताया गया था फर्जी

पूरा मामला तब शुरू हुआ जब राजेंद्र एडवोकेट नामक व्यक्ति, जिसने खुद को पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट का अधिवक्ता बताया था, ने एक चिट्ठी लिखी। इसमें उन्होंने मंडी सचिव पर ठोस सबूतों के साथ गंभीर आरोप लगाए थे।

इस चिट्ठी के बाद मंडी के तीन कर्मचारियों — सतबीर और दो अन्य — को तत्काल सस्पेंड कर दिया गया था, लेकिन आशा रानी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

बाद में मंडी बोर्ड के कुछ अधिकारियों ने यह तर्क दिया कि “गुमनाम चिट्ठी के आधार पर कार्रवाई नहीं हो सकती।” इससे जांच को भटकाने की कोशिश हुई।


‘कौन लिखी चिट्ठी?’ पर उलझा विभाग


डीसी उत्तम कुमार ने खोला घोटाले का राज

डीसी उत्तम कुमार ने मामले की प्रारंभिक शिकायत मिलते ही जांच के आदेश दिए।
अतिरिक्त उपायुक्त (ADC) और डीएमईओ ने मिलकर जब गेट पासों की तकनीकी जांच करवाई तो खुलासा हुआ कि कई पास ऐसे मोबाइल नंबरों और IP एड्रेस से जारी हुए थे जो करनाल क्षेत्र से संबंधित नहीं थे।

यानी मंडी सिस्टम को बाहरी नेटवर्क से एक्सेस कर फर्जी पास जारी किए जा रहे थे, जिससे सरकारी धान के आवागमन में धांधली आसान हो गई।

जांच में सामने आए संदिग्ध नंबर

जांच में ये मोबाइल नंबर और व्यक्ति सामने आए —

  • राजेंद्र कुमार, गांव बुधनपुर वीरान (इंद्री) – 7056245783
  • अमित कुमार, गांव जुंडला (दादूपुर रोरन) – 8950919399
  • अजय कुमार, गांव खेड़ी नारू – 9992064187

इन नंबरों से कई गेट पास जारी होने की पुष्टि हुई है।


अब साइबर सेल करेगा तकनीकी विश्लेषण

डीसी कार्यालय की सिफारिश पर अब साइबर सेल को पूरा डेटा सौंप दिया गया है।
सेल के अधिकारियों का कहना है कि वे मंडी सिस्टम के सर्वर लॉग, लोकेशन डेटा और IP हिस्ट्री की जांच करेंगे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन अधिकारियों और निजी लोगों की मिलीभगत थी।


करनाल में धान फर्जीवाड़ा कोई नया मामला नहीं

यह पहली बार नहीं है जब करनाल मंडियों में ऐसे घोटाले सामने आए हों।
इससे पहले घरौंडा, जुंडला, निसिंग और तरावड़ी मंडियों में भी इसी तरह के फर्जीवाड़े के मामले सामने आए थे।

इन मंडियों में छह अधिकारियों पर 5 करोड़ 93 लाख 86 हजार 936 रुपये मूल्य के धान के गायब होने के आरोप में केस दर्ज किए जा चुके हैं।
इनमें राइस मिल संचालक सतीश कुमार, तरावड़ी मंडी सचिव संजय, निरीक्षक रामफल, यशवीर, संदीप, समीर और लोकेश के नाम शामिल हैं।


बड़ा सवाल: गिरफ्तारी कब होगी?

मंडी सचिव आशा रानी पर एफआईआर दर्ज हुए 48 घंटे से अधिक हो चुके हैं, फिर भी अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई है।
सूत्रों का कहना है कि अभी भी कुछ “अदृश्य शक्तियां” उन्हें बचाने में लगी हुई हैं।

सूत्रों के मुताबिक, खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के इंस्पेक्टर समीर समेत कई अन्य अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल हैं, लेकिन अभी तक किसी को हिरासत में नहीं लिया गया है।


सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति की परीक्षा

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने हाल ही में भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस” की नीति को दोहराया था।
इस मामले में डीसी को सरकार का पूरा समर्थन मिला है, जिससे कार्रवाई संभव हो पाई।

अब देखना यह है कि पुलिस प्रशासन इस एफआईआर को कितनी गंभीरता से आगे बढ़ाता है और क्या आरोपियों को जल्द हिरासत में लिया जा सकेगा।



एक गुमनाम चिट्ठी से शुरू हुई सच्चाई की लड़ाई

यह केस सिर्फ एक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई भर नहीं, बल्कि एक प्रतीक है कि सिस्टम में छिपे भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए कभी-कभी एक “गुमनाम चिट्ठी” भी काफी होती है।

जहां एक ओर ऊंचे संपर्क और राजनीतिक रसूख विफल रहे, वहीं दूसरी ओर ईमानदार प्रशासनिक नेतृत्व ने यह दिखाया कि अगर इच्छा शक्ति हो, तो व्यवस्था के भीतर से भी सुधार संभव है।

अब जनता की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह मामला केवल एफआईआर तक सीमित रहता है या फिर कानून की पकड़ सच में दोषियों तक पहुंचती है।


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