उम्मीदों से भरी शुरुआत और एक चौंकाने वाला अंत
बिहार चुनाव 2025 को लेकर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले महागठबंधन से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन नतीजे उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे। यह जोड़ी, जिसे सत्ताधारी गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा था, चुनावी रण में कोई प्रभावी असर छोड़ने में नाकाम रही। तो आखिर वो कौन से कारण थे जिनकी वजह से यह शक्तिशाली मानी जा रही जोड़ी चुनावी मैदान में असफल हो गई? आइए, इसके पीछे के पाँच प्रमुख कारणों का विश्लेषण करते हैं।
2.0 पहला कारण: गठबंधन में तालमेल और रणनीति की कमी
कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बीच गठबंधन तो हुआ, लेकिन उसमें रणनीतिक स्पष्टता और आपसी तालमेल का गंभीर अभाव दिखा। सीट-बँटवारे को अंतिम रूप देने और एक साझा प्रचार अभियान की रणनीति बनाने में हुई देरी ने शुरुआत से ही गठबंधन की नींव को कमजोर कर दिया। इस कमजोर समन्वय का सबसे बड़ा सबूत यह था कि प्रचार के दौरान "राहुल और तेजस्वी ने एक मंच पर बहुत कम रैली की," जिससे ज़मीनी स्तर पर एक बिखरे हुए नेतृत्व का संदेश गया। इस वजह से कई सीटों पर "दोस्ताना लड़ाई" की नौबत आ गई, जिससे विपक्ष के वोट आपस में ही बँट गए। यह महज़ वोटों का बँटवारा नहीं था, बल्कि ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने वाली एक रणनीतिक भूल थी।
किसी भी राजनीतिक गठबंधन की सफलता के लिए आंतरिक एकता और एक स्पष्ट, एकजुट रणनीति सबसे ज़रूरी होती है। बिहार जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक समीकरण वाले राज्य में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहाँ एक भी गलत कदम पूरे चुनावी गणित को बिगाड़ सकता है।
राहुल गांधी एवं तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के भीतर मतभेद सुलझाने में विफल रहे।
3.0 दूसरा कारण: सामाजिक समीकरण साधने में विफलता
विपक्षी गठबंधन की रणनीति काफी हद तक अपने पारंपरिक "मुस्लिम-यादव (M-Y)" वोट बैंक पर ही केंद्रित रही। यह जोड़ी इस सामाजिक आधार से आगे बढ़कर अन्य समुदायों तक अपनी पहुँच बनाने में पूरी तरह नाकाम रही। गठबंधन एक रणनीतिक जाल में भी फँस गया; एक तरफ "कांग्रेस की कोशिश रही कि वह पिछड़े एवं अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC) के करीब आए, लेकिन इस प्रक्रिया में वह अपना ऊपर-वर्ग का वोट बैंक खोती हुई दिखी।" इस दुविधा के कारण वे किसी भी नए सामाजिक समूह को निर्णायक रूप से अपने साथ नहीं जोड़ पाए।
इसके ठीक विपरीत, सत्ताधारी गठबंधन ने बड़ी चतुराई से महिलाओं, युवाओं और विशेषकर अति पिछड़े वर्गों (EBC) को लक्षित किया और उनका समर्थन हासिल करने में सफल रहा। आधुनिक चुनावों में केवल एक सीमित सामाजिक आधार पर निर्भर रहना एक जोखिम भरी रणनीति है, और विपक्ष अपने सामाजिक समीकरण का विस्तार न कर पाने की वजह से चुनावी दौड़ में बुरी तरह पिछड़ गया।
4.0 तीसरा कारण: विकास का कोई ठोस विकल्प नहीं दे पाना
विपक्षी गठबंधन का पूरा प्रचार अभियान सरकार की आलोचना करने और "वोट-चोरी" जैसे नकारात्मक मुद्दों को उठाने पर केंद्रित रहा। उन्होंने जनता के सामने विकास का कोई ठोस, विश्वसनीय और आकर्षक वैकल्पिक मॉडल पेश नहीं किया। हालाँकि तेजस्वी यादव ने युवाओं को रोजगार देने के वादे किए, लेकिन उन वादों में विशिष्टता और गहराई की कमी थी, जिसके कारण वे मतदाताओं को यह भरोसा नहीं दिला सके कि उनके पास सरकार से बेहतर कोई योजना है। नतीजतन, मतदाताओं के सामने एक स्पष्ट विकल्प के बजाय केवल एक नाराज़ आवाज़ थी, जो सत्ता परिवर्तन के लिए पर्याप्त नहीं होती।
चुनाव जीतने के लिए केवल मौजूदा सरकार की कमियों को उजागर करना ही काफी नहीं होता। मतदाताओं को एक सकारात्मक दृष्टिकोण और एक भरोसेमंद विकल्प की भी जरूरत होती है। विपक्ष इस मोर्चे पर कमजोर साबित हुआ और जनता को यह समझाने में असफल रहा कि वह शासन का एक बेहतर विकल्प प्रदान कर सकता है।
5.0 चौथा कारण: नेतृत्व की छवि और स्थानीय जुड़ाव में कमजोरी
इस चुनाव में नेतृत्व की छवि एक निर्णायक कारक बनकर उभरी। तेजस्वी यादव अपनी "मुस्लिम-यादव नेता" की छवि से बाहर निकलकर एक सर्वमान्य नेता के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने में संघर्ष करते दिखे। वहीं दूसरी ओर, राहुल गांधी का बिहार से स्थानीय जुड़ाव कमजोर महसूस किया गया; उनकी "बिहार-वाङ्मय में कलाबाज़ी कम महसूस हुई," यानी वे राज्य के राजनीतिक मुहावरों और ज़मीनी नब्ज को पकड़ने में चूक गए।
इसकी तुलना में, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की "अनुभव" और "कल्याणकारी योजनाओं के वितरण" पर आधारित छवि मतदाताओं को अधिक भरोसेमंद लगी। इस नेतृत्व शून्य ने सत्ताधारी दल को अपनी कहानी को बिना किसी चुनौती के स्थापित करने का मौका दिया, जहाँ विपक्ष साफ तौर पर पीछे रह गया।
6.0 पाँचवाँ कारण: सही समय पर सही मौके चूकना
चुनावी रणनीति में समय का बहुत महत्व होता है, और विपक्ष ने इस मामले में कई बड़ी गलतियाँ कीं। गठबंधन को अंतिम रूप देने, सीटों का बँटवारा करने और प्रचार अभियान शुरू करने में हुई देरी ने उन्हें शुरुआत से ही रक्षात्मक मुद्रा में धकेल दिया। विपक्ष ने कई मुद्दे तो उठाए, लेकिन उन पर सही समय पर एक राष्ट्रव्यापी माहौल बनाने और उसे वोटों में बदलने में असफल रहा। इस प्रतिक्रियाशील दृष्टिकोण ने उन्हें हमेशा सत्ता पक्ष से एक कदम पीछे रखा, जिससे वे कभी भी चुनावी विमर्श की दिशा तय नहीं कर पाए।
इसके विपरीत, सरकार ने चुनाव से ठीक पहले महिलाओं और युवाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा की और अपने प्रचार में इसका भरपूर इस्तेमाल किया। चुनाव के तेज़-तर्रार माहौल में सही समय पर सही कदम उठाना सफलता की कुंजी है, और विपक्ष अपनी सुस्त रणनीति के कारण महत्वपूर्ण अवसर चूक गया।
7.0 निष्कर्ष: भविष्य के लिए सबक
राहुल-तेजस्वी की जोड़ी की विफलता के पीछे गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी, एक सीमित सामाजिक आधार, विकास के ठोस विकल्प का अभाव, कमजोर नेतृत्व और रणनीतिक समय-चूक जैसे कारण तो थे ही, लेकिन सबसे बड़ी और दुखद बात यह है कि विपक्ष की यह हार एक ऐसे समय में हुई जब वह जीत सकता था। इन सब कारणों ने मिलकर विपक्ष को उस व्यापक जन-आशा और बदलाव की उम्मीद के मोड़ पर कमजोर कर दिया, जहाँ राज्य के निवासी एक बदलती सोच के साथ वोट देने को तैयार थे। यह हार सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक बड़े अवसर को गँवाने की कहानी है।
इन नतीजों से सबक लेकर, क्या बिहार का विपक्ष भविष्य में एक ज़्यादा एकजुट और व्यापक रणनीति के साथ वापसी कर पाएगा?