करनाल मंडी का 125 करोड़ का फर्जी गेटपास कांड: जब भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेंस” का मतलब हो – शून्य ध्यान
✍️ By Manoj Thakur | व्यंग्य रिपोर्ट
भ्रष्टाचार पर पुष्पित-पल्लवित होती ब्यूरोक्रेसी की बगिया
जब भ्रष्टाचार को खत्म करने की जगह कुछ अफसर उसे “पोषण” देना शुरू कर दें, सियासत इस पोषण को “नीतिगत समर्थन” में बदल दे, और मीडिया भी चारण-भाट की भूमिका निभाने लगे, तो समझ लीजिए—घोटाले अब खबर नहीं, बल्कि सरकारी दिनचर्या बन गए हैं।
करनाल मंडी में धान की खरीद के दौरान फर्जी गेट पास काटकर 125 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। लेकिन क्या हुआ? कुछ नहीं। जिस अधिकारी की भूमिका सबसे अहम बताई जा रही है, वही अधिकारी आज भी अपने पद पर “अटल” बैठी हैं। लगता है अब “अटलता” सिर्फ निष्ठा में नहीं, भ्रष्टाचार में भी मापी जाने लगी है।
सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति – या जीरो रिस्पॉन्स नीति?
कहा गया था कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस रहेगा। अब समझ आया कि इस नीति का मतलब शायद “जीरो ध्यान” या “जीरो एक्शन” रहा होगा।
क्या करनाल मंडी घोटाला सिर्फ “तीन बकरे बलि” मॉडल पर निपटाया जाएगा?
सियासत की चुप्पी – घोटाले के प्रति मौन समर्थन
राजनीति में कहा जाता है — “चुप रहना भी कभी-कभी बयान होता है।” करनाल के नेता शायद यही कला सीख चुके हैं। चुनाव के वक्त जो नेता “भ्रष्टाचार उखाड़ फेंकेंगे” का नारा लगाते थे, अब वही नेता “मौन साधना” में व्यस्त हैं।
कांग्रेस की हालत तो और भी दिलचस्प है। राज्यसभा सदस्य कुमारी सैलजा, जो हर विषय पर प्रेस नोट जारी करती हैं, इस मुद्दे पर दो शब्द तक नहीं बोल पाईं। लगता है पार्टी ने “मंडी” शब्द को ही अपने शब्दकोश से निकाल दिया है।
किसानों की पीड़ा – और अफसरों की ऐश
इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा नुकसान किसका हुआ? किसान का। वह किसान, जो सुबह चार बजे ट्रैक्टर में धान लादकर मंडी पहुंचता है, पसीने से भीगा हुआ, उम्मीदों से भरा हुआ। लेकिन मंडी के अंदर जाते ही उसे फाइलों, रजिस्टरों और “गेट पास” की भूलभुलैया में फंसा दिया जाता है।
यह वही मंडी है जहां 125 करोड़ के फर्जी गेट पास बन गए, और असली किसान अब भी लाइन में खड़ा है — “मेरा नंबर कब आएगा?” उधर अफसर एसी दफ्तर में बैठकर बयान दे रहे हैं — “हमें जानकारी नहीं थी कि घोटाला हुआ है।” वाह! अब तो लगता है “अनजान बने रहना” ही सबसे बड़ा प्रशासनिक कौशल बन गया है।
जब नेता जनता के बीच लौटेंगे…
बीजेपी को समझना होगा कि ब्यूरोक्रेसी की जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती। उनकी नियुक्ति के साथ ही रिटायरमेंट डेट तय हो जाती है। पर नेता को हर चुनाव में जनता के बीच जाना होता है।
चार साल बाद जब ये नेता गांव-गांव जाएंगे, तो वही किसान पूछेगा — “साहब, जब मंडी में मेरे निवाले की लूट मची थी, तब आप कहां थे?”
जनता सब जानती है
यह जनता है — सब देख रही है, सब समझ रही है। भले ही आज कोई कुछ नहीं बोल रहा, पर सबको पता है कि कौन नेता उस अफसर को संरक्षण दे रहा है। करनाल मंडी सचिव आशा रानी को बचाने में किसकी भूमिका है, यह रहस्य अब रहस्य नहीं रहा। बस औपचारिकता भर बाकी है — कि कब तक सत्ता की ढाल भ्रष्टाचार की दीवार को ढके रखेगी?
व्यंग्य में सच्चाई छिपी है
“एक राजा ने कहा, मेरे राज्य में कोई चोरी नहीं होती। मंत्री ने कहा, महाराज! चोरी तो होती है, पर आपके सामने कोई बताने की हिम्मत नहीं करता।”
करनाल मंडी भी अब वैसी ही लगती है। घोटाला सबको दिख रहा है, पर कोई बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। क्योंकि जिसने आवाज उठाई, वह या तो ट्रांसफर हुआ, या सस्पेंड कर दिया गया।
सरकार को फैसला लेना होगा
अब गेंद पूरी तरह सैनी सरकार के पाले में है। यह तय करना होगा कि राज्य को अफसर चलाएंगे या अफसरों को जवाबदेह बनाने वाले नेता।
भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस सिर्फ नारे में नहीं, एक्शन में दिखना चाहिए। वरना जनता का भरोसा भी किसी दिन सस्पेंड हो जाएगा — बिलकुल उन्हीं तीन कर्मचारियों की तरह।
अंत में सवाल आपसे
क्या आप मानते हैं कि करनाल मंडी का यह गेट पास घोटाला भ्रष्टाचार का क्लासिक उदाहरण है?
अगर हाँ — तो इस खबर को लाइक करें, शेयर करें और सोचें —
अगर आज आवाज नहीं उठेगी,
तो कल आपकी मेहनत का दाना भी किसी “गेट पास” में फंस जाएगा।
🖋️ लेखक: मनोज ठाकुर
(स्वतंत्र पत्रकार एवं व्यंग्यकार)