आखिर क्यों मनोहर लाल अभी तक अपने मंत्री तय नहीं कर पा रहे है
मंत्री बिन सरकार का कंफ्यूजन , क्यों नहीं बन रही पोर्टफोलियो पर सहमति
द इंसाइडर न्यूज ब्यूरो , चंडीगढ़
बात उस वक्त की है, जब सीएम मनोहर लाल प्रदेश में जनआशीर्वाद यात्रा निकाल रहे थे। उनका आत्मविश्वास देखने लायक था। हालांकि यात्रा में भीड़ कम थी, लेकिन भाजपा मतदाता के बदले मिजाज को भांपने में नाकामयाब रहीं। सीएम ने एक ही दावा किया, 75 पार। हर कोई सीएम की हां में हां मिलाता नजर आ रहा था। हालात यह थे कि राजनीतिक पंडित भी गच्चा खा गए। उन्हें समझ में ही नहीं आया कि अंडर करंट चल क्या रहा है। सब यहीं मान कर चल रहे थे कि 75 पार न सही भाजपा सरकार तो बहुमत से बना लेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हरियाणा के मतदाता ने भाजपा को ऐसा झटका दिया कि पार्टी अभी तक इससे उभर नहीं पा रही है। हालात यह है कि सीएम की शपथ लेने के बाद भी अभी तक मनोहर लाल अपने मंत्रियों का चयन नहीं कर पा रहे हैं। क्यों यह कंफ्यूजन है।
आत्मविश्वास डगमंगा गया
भाजपा बहुमत से छह विधायक दूर रह गयी। दो मंत्रियों को छोड़ सात मंत्री चुनाव हार गए। सीएम मनोहर लाल का अपने विधानसभा क्षेत्र से जीत का मार्जन इस बार 45,188 रह गया, जबकि पिछली बार यह 63, 773 हजार था। पार्टी को जमीनी हकीकत पता ही नहीं थी। इससे मनोहर लाल के आत्मविश्वास डगमंगा गया है। सीएम के विरोधी शुरुआत के तीन साल तो उन्हें अनुभवहीन करार देते रहे। लेकिन जैसे ही केंद्र सरकार मजबूत हुई, उनकी पार्टी के ज्यादातर विधायक उनके सामने झुक गए। यहीं वजह रही कि आखिर के डेढ़ साल सीएम मनोहर लाल लगभग निरंकुश की तरह व्यवहार करने लगे थे। उन्हें लगा था कि जिस तरह से लोकसभा चुनाव में भाजपा को समर्थन मिला था। विधानसभा में भी ठीक ऐसा ही होगा।
क्यों बनी यह स्थिति
भाजपा ने ग्राउंड पर काम नहीं किया। राष्ट्रवाद अब मतदाता को भाजपा से जोड़ता नहीं है। मनोहर लाल की प्रशासनिक अनुभवहीनता की वजह से आम आदमी को खासी दिक्कतों को सामना करना पड़ा। रही सही कसर सरकारी नौकरी की भर्ती परीक्षा ने पूरी कर दी। परीक्षार्थियों को लंबा सफर तय कर परीक्षास्थल तक पहुंचना पड़ा। इससे युवाओं में सरकार के प्रति गहरा गुस्सा था। जाट मतदाता भी भाजपा से अलग हुआ। विकास की बात की जाए तो प्रदेश में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसे विकास से जोड़ा जा सके। खुद सीएम मनोहर लाल के विधानसभा क्षेत्र में सिर्फ एक विकास कार्य हुआ, वह था गेट बनने का काम, वह भी आधे अधूरे पड़े हैं। सड़कों की हालत ऐसी है कि चलना तक मुश्किल है।
तो अब क्या दिक्कत है
एक समय दिल्ली दरबार में सबसे मजबूत सीएम समझे जाने वाले मनोहर लाल इस वक्त वहां खासे कमजोर है। यहीं वजह है कि अब उनके सामने चैलेंंज है कि किस विधायक को मंत्री बनाया जाए, किसे छोड़ा जाए। दूसरी दिक्कत उनके सामने यह है कि मंत्रियों को पोर्टफोलियो क्या क्या दिया जाए। यानी अब संतुलन साधना उनके लिए बड़ी समस्या बना हुअा है। मनोहर लाल यह बेहतर तरीके से जानते हैं कि अब विधायकों का थोड़ा सा असंतोष भी उनके लिए बड़ी परेशानी बन सकता है। सीएम के सामने दूसरा चैलेज है जजपा को साथ लेकर चलना। जो उनके लिए सबसे ज्यादा दिक्कत वाली बात है। क्योंकि जजपा जहां अति उत्साही है, वहीं मनोहर लाल निर्णय लेने में खासा वक्त लेते हैं।
सभी को साथ लेकर चलना होगा
अब मनोहर लाल को न सिर्फ अपने विधायकों को बल्कि जेजेपी को भी साध कर चलना होगा। जो फिलहाल उनके लिए खासा मुश्किल काम नजर आ रहा है। क्योंकि पिछली सरकार में उन्होंने जिस तरह से कार्यकर्ताओं को धमकाया, यदि इसी तरह के तेवर इस बार भी रहे तो उनके लिए इस बार सीएम का सफर मुश्किल भरा हो सकता है। मनोहर लाल इस बार सीएम की कुर्सी पर भले ही बैठे हो, लेकिन ऐसा आभास होता नजर आ रहा है कि ज्यादा चलेगी जेजेपी की। यूं भी जेजेपी को पता है कि उन्हें मतदाता के बीच में पकड़ बनानी है तो कुछ ऐसे कड़े निर्णय लेने होंगे जो भाजपा को अच्छे लगे या न लगे।