पर्यावरण पर सरकार की कोशिश: किसानों पर
मामलें दर्ज कर, खुद को पाक साफ दिखाया
मामलें दर्ज कर, खुद को पाक साफ दिखाया
- अकेले करनाल में 108 किसानों पर मामला दर्ज, 278 मामले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपे, प्रदेश में 1289 किसानों पर दर्ज कराए मामले
द न्यूज इंसाडर ब्यूरो, करनाल
प्रदूषण पर कोर्ट के निशाने पर आई सरकार ने खुद के बचाव का रास्ता निकाल लिया। प्रदेश भर के किसानों पर पुराल जलाने के मामले दर्ज करने शुरू कर दिए हैं। अकेले करनाल में 108 मामले दर्ज हो गए हैं। दूसरी ओर 278 मामले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपे गए है। प्रदेश में दर्ज मामलों की संख्या 1289 तक पहुंच गयी है। आकृति संस्था के अध्यक्ष अनुज सैनी ने बताया कि प्रदूषण के लिए अकेला किसान जिम्मेदार नहीं है। सरकार की यह कार्यवाही गलत है। भारतीय किसान यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष रतन मान ने कहा कि विधानसभा चुनाव संपन्न हो गए हैं, अब क्योंकि इस सरकार को वोट की जरूरत नहीं है, इसलिए किसानों को टारगेट किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार के पास पर्यावरण संरक्षण की कोई नीति ही नहीं है। सिर्फ दावे हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सरकार पूरी तरह से किसान विरोधी सरकार है। दर्ज मामलों से यह साबित हो रहा है।
बड़ा सवाल: क्या किसान ही दोषी है
आकृति संस्था के अध्यक्ष अनुज सैनी ने बताया कि सेक्टर सात के पार्क में सरेआम पत्ते चलाए जा रहे हैं। कोई इस ओर ध्यान क्यों नहीं दे रहा है। यह एक जगह नहीं हो रहा है। हर जगह ऐसा हो रहा है। लेकिन दोष सिर्फ किसान को दिया जा रहा है। किसान को जिम्मेदार ठहरा कर दरअसल सरकार समस्या को बहुत छोटा कर आंक रही है। दूसरा किसानों के लिए कौन आवाज उठाएंगा? इसलिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
पर्यावरण बचाते हैं किसान
मामला दर्ज करने वाला प्रशासन यह भूल गया कि किसान को पर्यावरण को बचाता है, एग्रोफॉरेस्ट्री के माध्यम से कितना आक्सीजन किसान वायुमंडल के लिए तैयार करता है। पर्यावरणविद सतीश कुमार ने बताया कि यह बात क्यों भूल रहे हैं, किसानों को क्या इसके लिए अतिरिक्त पैसा मिलता है। कार्बन फुटप्रिंट कम करने में किसान का योगदान कितना है, क्या इसका आंकलन किया गया।
पर्यावरण को सबसे ज्यादा असर तो किसान पर पड़ता है
पर्यावरणविद अनुज सैनी ने बताया कि वातावरण में थोड़ा सा बदलाव भी किसान को प्रभावित करता है। शहरी लोग तो थोड़ी गर्मी लगने पर एसी चला लेते हैं, सर्दी होने पर हीटर। किसान की फसल तो खेतों में हैं, वहां तो इस तरह के बदलाव का सीधा असर पड़ता है। यह तथ्य किसान भी जानता है। फिर वह कैसे पर्यावरण खराब कर सकता है। सैनी ने बताया कि किसानों को बदनाम किया जा रहा है, जिससे सरकार अपनी लापरवाही पर कोई तर्क गढ़ सके।
कृषि विभाग की जिम्मेदारी क्यों नहीं ?
1 जो अभियान चलाया इसका क्या हुआ
अनुज सैनी ने बताया कि किसानों को पुराली न जलाने पर विभाग की ओर से एक अभियान चलाया गया था। लेकिन अभियान सिर्फ कागजों में चला। अधिकारियों ने इसे सही तरह से चलाया ही नहीं। इसके लिए आए पैसे को खुर्द बुर्द कर दिया गया।
2 पुराली का किसान क्या करें? कोई विकल्प नहीं दिया
पुराली का क्या किया जा सकता है। किसानों को कोई विकल्प ही नहीं दिया। जबकि होना यह चाहिए कि किसानों को इसके लिए कोई विकल्प दिया जाना था। इसके लिए कृषि विभाग को काम करना चाहिए था। लेकिन इस दिशा में कुछ नहीं हुआ।
3 कृषि विभाग, वन विभाग और प्रदूषण नियंत्रण विभाग में तालमेल नहीं है
तीन विभाग सीधे तौर पर जिम्मेदार है। लेकिन इसमें कोई तालमेल नहीं है। तीनों ही विभाग मिल कर किसानों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश में हैं, जबकि इनकी जिम्मेदारी बनती है कि समस्या का समाधान क्या हो सकता है। इस दिशा में काम होना चाहिए।
तीनों राज्यों के चीफ सेक्रेटरी की बैठक दिल्ली में
पर्यावरण को लेकर दिल्ली में तीनों चीफ सेक्रेटरी की बैठक है। इसमें अधिकारी अपने अपने राज्यों में पर्यावरण को लेकर क्या कर रहे हैं, इसकी जानकारी देंगे। अनुज ने बताया कि यह बैठक सिर्फ पीपीटी दिखाने तक ही सीमित है। इस तरह की बैठकों से कुछ हल नहीं निकलने वाला है। हकीकत यह है कि सरकार की कोई ऐसी नीति ही नहीं कि पुराली की समस्या से निपटा कैसे जाए? उन्होंने यह भी बताया कि सिर्फ दिखावा और हो हल्ला हो रहा है। जो न तो पर्यावरण के लिए सही है और न ही किसानों और आम आदमी के लिए।
भाकियू की चेतावनी
उधर किसानों के लिए काम करने का दावा करने वाले किसान संगठनों ने सरकार को सीधे ही चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सरकार ने किसानों पर दर्ज केस वापस नहीं लिए तो किसान जेल भरों आंदोलन शुरू कर देगी। किसानोंं पर अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रदूषण फैलाने के लिए किसानों को जिम्मेवार ठहराना वाजिब नहीं है। अगर ऐसा है तो उद्योगों में काेयले जलाए जा रहे है, सरकारे हरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलवा रही है। वहीं कि हर तरीके से प्रदूषण फैल रहा है। इसके लिए अकेले किसानों को जिम्मेवार ठहराना तर्क संगत नहीं है। भाकियू ने तो साफ कर दिया है कि सरकार उन्हें एक तारीक निर्धारित कर दे, जिस दिन किसान स्वयं ही आकर जेल में गिरफ्तारी दे।
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