करनाल अनाज मंडी में फर्जी गेट पास घोटाला: वकील की शिकायत से खुला 125 करोड़ का घपला, सवालों के घेरे में बड़े अधिकारी
करनाल,
हरियाणा के करनाल जिले की अनाज मंडी में एक बार फिर बड़ा भ्रष्टाचार उजागर हुआ है। मंडी में धान की फर्जी खरीद के आरोपों ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिला दिया है। शहर के वकील राजेंद्र कुमार चौहान ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, चीफ विजिलेंस ब्यूरो, खाद्य आपूर्ति मंत्री और प्रधानमंत्री तक को शिकायत भेजकर बड़ा खुलासा किया है। शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया है कि डीसी, एसडीएम, मंडी सचिव आशा रानी, इंस्पेक्टर समीर, मंडी प्रधान त्यागी और चेयरमैन विजेंद्र गुप्ता ने मिलकर फर्जी गेट पास काटकर करीब 125 करोड़ रुपये का घोटाला किया है।
धान का उत्पादन घटा, पर मंडी में रिकॉर्ड आवक
शिकायत में बताया गया है कि इस साल बरसात और ‘टूमरू’ व ‘हल्दी’ बीमारी की वजह से धान का उत्पादन करीब 15 प्रतिशत कम हुआ, फिर भी 25 अक्टूबर तक मंडी में पिछले साल से एक लाख क्विंटल ज्यादा धान की आवक दर्ज की गई। कृषि विशेषज्ञ रोहित चौहान के अनुसार यह आंकड़ा किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं कहा जा सकता। पंजाब केसरी ने पहले भी इस पर सवाल उठाए थे कि करनाल मंडी में फर्जी खरीद का खेल चल रहा है।
फर्जी गेट पास से शुरू होता है खेल
मंडी के भीतर यह खेल बेहद संगठित तरीके से होता है।
वास्तव में धान आती ही नहीं, बल्कि कागजों में खरीद दिखाई जाती है। मंडी के गेट पर फर्जी गेट पास काटा जाता है, और फिर उसी पास के आधार पर यह दिखाया जाता है कि धान किसी आढ़ती की दुकान पर पहुंच गई। इसके बाद बोली लगाने वाला कर्मचारी और आढ़ती किसी मिल संचालक को यह धान कागजों में बेच देते हैं।
जिस किसान के नाम पर गेट पास कटा होता है, उसके खाते में रकम आती है — लेकिन यह रकम कई हिस्सों में बंट जाती है। इसमें आढ़ती, मंडी कर्मचारी, गेट पास काटने वाला और मिल संचालक सबका हिस्सा होता है। अंत में मिल संचालक बिहार या यूपी से सस्ता चावल खरीद कर सरकार को लौटाता है, जिससे धान को प्रोसेस किए बिना ही चावल बन जाता है।
फर्जी खरीद से सरकार को 125 करोड़ का नुकसान
एडवोकेट राजेंद्र चौहान का कहना है कि करनाल मंडी में करीब पांच लाख क्विंटल फर्जी धान की खरीद दिखाई गई, जिससे सरकार को 125 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हुआ। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक मंडी का आंकड़ा है। अगर पूरे जिले या राज्य की मंडियों की जांच की जाए तो घोटाले का आंकड़ा हजारों करोड़ तक पहुंच सकता है।
सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई, बड़े अधिकारी बच निकले
शिकायत के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर सरकार ने तीन अधिकारियों को निलंबित तो कर दिया, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
वकील चौहान का कहना है, “यह सिर्फ छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाने का मामला है। डीसी, एसडीएम और मंडी सचिव जैसे अधिकारी इस खेल से अनजान नहीं हो सकते। सरकार को चाहिए कि विजिलेंस से उच्चस्तरीय जांच कराए।”
किसानों और गरीबों के हक पर डाका
फर्जी गेट पास के जरिए यह खेल न सिर्फ सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि किसानों और गरीबों के हक पर भी सीधा डाका है।
सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत राहत देती है, लेकिन इस व्यवस्था का फायदा भ्रष्ट अधिकारी और फूड माफिया उठा रहे हैं। दूसरी ओर, जो चावल मिल संचालक यूपी-बिहार से खरीदते हैं, वह ज्यादातर पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) का होता है — यानी गरीबों के लिए भेजा गया अनुदानित चावल। यह चावल माफिया मंडी के भ्रष्ट तंत्र से जोड़कर दोबारा बाजार में खपा देते हैं।
जनता में आक्रोश, विपक्ष ने उठाए सवाल
इस घोटाले की खबर फैलते ही करनाल और आसपास के इलाकों में राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। विपक्ष ने सरकार पर बड़े अधिकारियों को बचाने का आरोप लगाया है। वहीं, स्थानीय किसानों का कहना है कि इस तरह के भ्रष्टाचार से उनकी मेहनत का पैसा माफिया और अधिकारी खा जाते हैं।
किसान नेता मेहर सिंह ने कहा, “अगर मुख्यमंत्री वास्तव में जीरो टॉलरेंस की नीति पर चल रहे हैं, तो सिर्फ निलंबन नहीं — गिरफ्तारी होनी चाहिए। जब तक दोषी जेल नहीं जाएंगे, तब तक किसानों के साथ अन्याय खत्म नहीं होगा।”
विजिलेंस जांच की मांग तेज
अब यह मामला विजिलेंस जांच की मांग तक पहुंच गया है। शिकायत में साफ कहा गया है कि 6 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2025 तक काटे गए सभी गेट पास की जांच की जाए। इसमें कई आढ़तियों और मंडी कर्मचारियों के नाम भी शामिल हैं।
अगर यह जांच निष्पक्ष हुई तो मंडी के भीतर वर्षों से चल रहे फर्जी खरीद तंत्र की परतें खुल सकती हैं।
निष्कर्ष
करनाल अनाज मंडी का यह मामला सिर्फ एक जिले का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की पोल खोलने वाला है। धान की खरीद के नाम पर हुआ यह फर्जीवाड़ा बताता है कि किस तरह कुछ अधिकारी और माफिया मिलकर किसानों और गरीबों के हक पर डाका डाल रहे हैं।
सरकार भले ही तीन अधिकारियों को सस्पेंड कर चुकी है, लेकिन जब तक इस घोटाले की गहन जांच नहीं होती, तब तक न तो सच्चाई सामने आएगी और न ही भ्रष्टाचार पर लगाम लग पाएगी।
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