क्या करनाल डीटीपी विभाग में फिर पनप रहा है भ्रष्टाचार?


अवैध कब्जा हटाने के नाम पर क्यारी की दीवार तोड़ी, ओपीएस की विवादित बिल्डिंग पर यूं बरती डीटीपी ने मेहरबानी 


आपको याद होगा डीटीपी अधिकारी बिक्रम सिंह का मामला, जिसे अवैध कॉलोनियों को विकसित करने की एवज में रिश्वत लेने के आरोप में पकड़ा गया था। उस कार्रवाई के बाद उम्मीद जगी थी कि करनाल का डीटीपी विभाग अब पारदर्शिता और नियमों के मुताबिक काम करेगा।



 लेकिन क्या हालात सच में बदले हैं? या फिर वही पुरानी कहानी नए रूप में सामने आ रही है? सेक्टर-32 की क्यारी और ओपीएस बिल्डिंग का सवाल सेक्टर-32 में नूर महल होटल के पीछे एक क्यारी है, जहां बैंगन और चेरी टमाटर के पौधे लगाए गए थे। मवेशियों से सुरक्षा के लिए मालिक ने चारदीवारी कर दी। डीटीपी विभाग की नजर में यह चारदीवारी अवैध निर्माण थी। विभाग का दस्ता मौके पर पहुंचा, दीवार ढहा दी गई और आसपास हो रहे छोटे-मोटे निर्माण भी तोड़ दिए गए। अब तक सब कुछ नियमों के तहत कार्रवाई जैसा प्रतीत होता है। लेकिन सवाल तब उठता है जब इसी क्यारी से सटी ओपीएस बिल्डिंग की दीवार को न सिर्फ अछूता छोड़ा जाता है, बल्कि उसे किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे, इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। 




जबकि आरोप हैं कि यह बिल्डिंग बहुमंजिला है और निर्माण कार्य लंबे समय से जारी है। यदि छोटे निर्माण अवैध हैं तो बड़े निर्माण पर कार्रवाई क्यों नहीं? जिम्मेदारी से बचने का खेल? डीटीपी विभाग का कहना है कि यह निर्माण नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आता है। यदि ऐसा है तो क्या नगर निगम को लिखित सूचना दी गई? क्या संयुक्त कार्रवाई का प्रयास हुआ? नगर निगम के अधिकारियों के अनुसार, इस बिल्डिंग को उनकी ओर से कोई अनुमति नहीं दी गई। ऐसे में सवाल और गहरे हो जाते हैं। 


यदि अनुमति नहीं है तो निर्माण कैसे जारी है? और यदि निर्माण अवैध है तो कार्रवाई क्यों नहीं? मिलीभगत के आरोप और उठते सवाल सीनियर पत्रकार देवेंद्र गांधी ने भी डीटीपी विभाग के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं और कथित चैट का जिक्र किया है, जिसमें एक अवैध कॉलोनाइजर से 95 लाख रुपये के लेन-देन की बात सामने आई है। 


इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि द न्यूज इनसाइडर नहीं करता, लेकिन जब एक के बाद एक घटनाएं सामने आती हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है। ओपीएस बिल्डिंग के संचालकों का दावा है कि उन्होंने नक्शे और अन्य औपचारिकताओं के लिए आवेदन किया हुआ है। 


लेकिन जब तक अंतिम स्वीकृति नहीं मिलती, तब तक निर्माण कार्य जारी रखना नियमों के विरुद्ध माना जाता है। यदि बिना मंजूरी के निर्माण हो रहा है और विभाग चुप है, तो यह प्रशासनिक लापरवाही है या कुछ और? क्या डीटीपी विभाग पर बाहरी प्रभाव? जब छोटे निर्माणों पर बुलडोजर चलता है और बड़े निर्माणों पर खामोशी छाई रहती है, तो यह दोहरे मापदंड का संकेत देता है।


 क्या नियम सिर्फ आम नागरिकों के लिए हैं? क्या प्रभावशाली लोगों के लिए अलग व्यवस्था है? यदि विभाग निष्पक्ष है तो उसे स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि ओपीएस बिल्डिंग की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है, क्या अनुमति दी गई है, और यदि नहीं दी गई तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। 


 जवाबदेही जरूरी है यह मामला केवल एक बिल्डिंग का नहीं है। यह प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन का सवाल है। यदि आरोप निराधार हैं तो विभाग को सार्वजनिक रूप से तथ्य सामने रखने चाहिए। और यदि कहीं अनियमितता है तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। 

 द न्यूज इनसाइडर का उद्देश्य केवल सवाल उठाना है, किसी पर व्यक्तिगत आरोप लगाना नहीं। लोकतंत्र में संस्थाओं की जवाबदेही तय करना मीडिया का दायित्व है। यदि आपको भी लगता है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, तो अपनी आवाज उठाइए। पारदर्शिता और ईमानदार प्रशासन के लिए जनजागरण जरूरी है।

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