"रामराज्य या वनविनाश? मुडागांव में जंगल कटाई और आदिवासी अस्मिता पर हमला"

त्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत सराईटोला का आश्रित ग्राम मुडागांव इन दिनों एक भीषण पर्यावरणीय और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। यहाँ अदानी समूह द्वारा एक परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर जंगल कटाई शुरू की गई है। इस कार्यवाही में न केवल भारी पुलिस बल की तैनाती की गई, बल्कि स्थानीय आदिवासियों को उनके घरों में नजरबंद किए जाने के आरोप भी लगे हैं।



यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब राज्य के वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने उसी क्षेत्र में “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान चलाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया था। ऐसे में सवाल उठता है — क्या यह दोहरी नीति नहीं है? क्या यह विकास की आड़ में पर्यावरण और आदिवासी अस्तित्व के साथ किया जा रहा छल नहीं है?


मुडागांव के जंगल — एक जीवनरेखा

मुडागांव का जंगल वहाँ रहने वाले आदिवासियों के लिए केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि आजीविका, संस्कृति और पहचान का स्रोत है। पीढ़ियों से इन वनों ने न केवल भोजन, दवा और ईंधन का सहारा दिया है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक परंपराओं में भी इनका विशेष स्थान रहा है।


एक स्थानीय आदिवासी महिला का कहना है —

"हमारी ग्राम सभा की राय को नजरअंदाज किया गया। हमें न तो सूचना दी गई, न ही हमारी बात सुनी गई।"

यह  दर्शाता है कि किस प्रकार वन अधिकार अधिनियम 2006 की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, जो आदिवासियों को उनके पारंपरिक जंगलों और भूमि पर अधिकार देता है।










“रामराज्य” या “दमनराज्य”?




जब ग्रामीणों को उनके ही घरों में बंद कर जंगल काटे जाएँ, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शर्मनाक स्थिति होती है। एक आदिवासी कार्यकर्ता का यह सवाल आज पूरे राज्य और देश के सामने गूंज रहा है —

"यह कैसा रामराज्य है, जहाँ हमें कैद कर हमारी माँ जैसी धरती काटी जा रही है?"

क्या रामराज्य का मतलब यही है कि विकास कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों की सुविधा तक सीमित रहे, और आम जनता विशेषकर आदिवासी समुदाय केवल बाधा समझे जाएँ?


अदानी-जिंदल का बढ़ता प्रभाव और सवालों के घेरे में सरकार

तमनार और हसदेव अरण्य क्षेत्र लंबे समय से अदानी और जिंदल समूह की परियोजनाओं के कारण विवादों में रहे हैं। पहले भी हसदेव में फर्जी ग्राम सभा प्रस्तावों के आधार पर जंगल काटे जाने के आरोप लगे थे, जिन्हें बाद में अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी स्वीकार किया।




अब मुडागांव में फिर वही कहानी दोहराई जा रही है —

  • बिना सहमति जंगल कटाई

  • पुलिस बल की भारी तैनाती

  • स्थानीय समुदाय की अनदेखी

सरकार की चुप्पी और अदानी समूह की "सतत विकास" की दावेदारियाँ अब खोखली लगने लगी हैं।


पर्यावरणीय संकट और जलवायु प्रतिबद्धताओं पर असर

भारत जैसे देश, जो जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध वैश्विक मंचों पर कार्बन उत्सर्जन घटाने और वन संरक्षण का वादा करता है, के लिए ऐसी घटनाएँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंताजनक हैं।

मुडागांव का जंगल केवल स्थानीय नहीं है — यह वैश्विक पारिस्थितिकी का हिस्सा है।
यहाँ की जैव-विविधता, जल स्रोत और पर्यावरण संतुलन पूरे क्षेत्र को प्रभावित करते हैं।


आगे क्या?

मुडागांव के आदिवासी और सामाजिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन की तैयारी शुरू कर दी है। 2024 में हसदेव अरण्य में भी ऐसा विरोध देखा गया था, जहाँ प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं और कई लोग घायल हुए।

अब देखना यह है कि क्या सरकार इस बार जनता की आवाज़ सुनेगी या फिर परियोजनाओं की रफ्तार के आगे हर आवाज़ कुचली जाएगी?


निष्कर्ष: विकास किसके लिए?

मुडागांव की यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है —
क्या विकास का मतलब केवल उद्योगपतियों के लिए संसाधनों की आसान पहुँच है? या इसमें स्थानीय समुदायों, पर्यावरण और भावी पीढ़ियों का भी स्थान है?

अगर जवाब दूसरा है, तो फिर मुडागांव की आवाज़ को अनसुना करना देश के भविष्य के साथ अन्याय है।


🌱 आप क्या सोचते हैं? क्या विकास और पर्यावरण में संतुलन संभव है? मुडागांव जैसे संघर्षों में किसका साथ देना चाहिए — पेड़ों का या प्रगति की आड़ में कटते जंगलों का?
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