कोई टाइटल नहीं

द न्यूज इनसाइडर के अंडर कवर रिपोर्टर का स्टिंग: पीवी बस औपचारिकता भर




क्या खाद्य आपूर्ति विभाग धान की फर्जी खरीद करने वाले मिलर्स को बचाने की कोशिश कर रहा है

अभी तक यह जांच ही नहीं हो रही कि क्यों मिलर्स को मिलिंग कमेटी के तय कोटे से ज्यादा धान दिया गया


द न्यूज इनसाइडर ब्यूरो , चंडीगढ़

जिस फिजिकल वैरिफिकेशन के दम पर सरकार धान खरीद घोटाले को पकड़ने की कोशिश कर रही है, इसके लिए बनी टीम भी भ्रष्टाचार में लिप्त है। द न्यूज इनसाइडर के अंडर कवर रिपोर्टर ने एक मिल में टीम की कार्यप्रणाली का जायजा लिया तो पाया कि टीम का ध्यान स्टॉक जांचने में कम और इस ओर ज्यादा कि रुपए कैसे मिलेंगे। टीम का व्यवहार बहुत ही खराब है। टीम के अधिकारी जब तक खुश्क लहजे में बात करते हैं, तब तक उनके पैसे न मिल जाए। इस दौरान वह ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं कि गड़बड़ी पकड़ कर ही रहेंगे। इसी बीच उनका एक दलाल जो कि उनके बीच का ही सदस्य होता है, वह कभी सेवा पानी तो कभी सीधे ही डील करने की कोशिश करता है। जिस मिलर्स के यहां पीवी हो रही होती है उसके चेहरे पर हवाईयां उड़ी रहती है। जैसे ही सौदा पट जाता है, अचानक सक कुछ सामान्य हो जाता है। इसके बाद तेज रफ्तार से चल रही जांच अचानक ही धीमी हो जाती है। देखते ही देखते पीवी टीम वहां से निकलने की कोशिश में जुट जाती है। जब न ज्यादा कागज मांगे जाते न जांच ही होती। पीवी की यह टीम उन मिलर्स को सबसे ज्यादा परेशान करती है जिनका सब कुछ सही है। अब क्योंकि वह रिश्वत नहीं देना चाहते। इसलिए टीम उन्हें बार बार तंग करती है। ऐसे मिल में पीवी की जांच कई बार तो पांच से छह घंटे तक चलती है। टीम के सदस्य ऐसे ऐसे बिल मांग लेते हैं जिनका इससे कोई लेना देना नहीं होता। उनकी हर संभव यहीं कोशिश रहती है कि कैसे इस मिलर्स पर दबाव बनाया जाए, जिससे वह रिश्चत दे। पीवी में ज्यादातर जगह यहीं खेल चल रहा है।


खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारी भी गड़बड़ करने वाले मिलर्स को बचाने की कोशिश में





एक बार फिर उन मिलर्स को बचाने की कोशिश हो रही है जिन्होंने इस बार सरकारी धान में बड़ा घोटाला किया है। खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारी ऐसे मिलर्स को बचाने की तैयारी में पूरी तरह से जुटे हुए हैं। उनकी यहीं कोशिश है कि किसी तरह से कुछ समय निकल जाए। इसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा। क्योंकि जैसे जैसे समय बीत रहा है, धान की फर्जी खरीद करने वाले मिलर्स यूपी और बिहार से चावल लाकर इसे फूड कारपोरेशन को सप्लाई कर रहे हैं। उनकी यहीं कोशिश है कि समय से पहले चावल यदि एफसीआई के गोदामों में जमा हो जाता है तो फिर कोई दिक्कत नहीं आएगी। इसी दिशा में बढ़ते हुए निदेशालय की ओर से एक पत्र जारी कर सभी मिलर्स से यह जानकारी मांगी है कि वह चावल कब तक जमा करा देंगे। यानी सरकार को तो यह दिखाया जाएगा कि चावल समयसीमा के अंदर ही आ रहा है। इसलिए किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई। लेकिन अधिकारी इस जल्दबाजी में यह ध्यान रखना भूल रहे हैं कि चावल मिलों की इतनी क्षमता है क्या? कि वह कम से कम समय में इतना अधिक चावल तैयार कर एफसीआई को सप्लाई कर देंगे। जाहिर है, चावल तैयार नहीं होगा, वह यूपी और बिहार से आएगा।



अधिकारियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं हो रही है

इसमें बड़ी बात तो यह है कि अभी तक मिलिंग कमेटी के तय कोटे से ज्यादा धान देने वाले इंस्पेक्टर की भूमिका की जांच क्यों नहीं हो रही है? आखिर कुछ राइस मिलर्स में ऐसा क्या था उन्हें तय कोटे से बहुत ज्यादा धान दिया गया। यूथ फॉर चेंज के प्रदेशाध्यक्ष एडवोकेट राकेश ढुल ने बताया कि धान की फर्जी खरीद में किसी न किसी स्तर पर इंस्पेक्टर की भूमिका भी संदिग्ध है। इसलिए उनकी जांच होनी ही चाहिए। हालांकि अधिकारियों ने ऐसे इंस्पेक्टर को कारण बताओं नोटिस जारी किया है, लेकिन इसके बाद आगे कोई कार्यवाही नहीं हो रही। जो अधिकारियों पर बड़ा सवाल है।


सरकार ने भी कम किया दबाव

क्योंकि अधिकारी एक ही राग अलाप रहे हैं कि राइस मिलर्स ने कुछ गलत नहीं किया, यहीं वजह है कि सरकार ने भी अब दबाव कम कर दिया है। इसके लिए मिलर्स और अधिकारियों ने सधी हुई चाल चली।लगातार सरकार पर दबाव बनाया गया। गड़बड़ी में शामिल रहे अधिकारियों ने







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