आजाद विधायक बलराज कुंडू ने खोला सरकार के खिलाफ मोर्चा नए विवाद से फिर परेशान भाजपा
विज के तेवर नर्म होने से क्या यह मान लें अब भाजपा में सब कुछ सही हो गया है?
मनोहर लाल के लिए अपने समर्थक विधायकों का संभालना सबसे बड़ी दिक्कत साबित हो रहा है। वह ऐसे राजनेता साबित नहीं हो पा रहे जो एक साथ सभी को साध कर चल सके। दूसरे कार्यकाल में यहीं उनकी बड़ी कमजोरी बन कर उभर रही है।
द न्यूज इनसाइडर ब्यूरो, चंडीगढ़
जैसे जैसे ठंड कम हो रही है प्रदेश का सियासी तापमान बढ़ता नजर आ रहा है। इसमें सबसे ज्यादा दिक्कत आ रही है प्रदेश के सीएम मनोहर लाल खट्टर को। क्योंकि उनकी दूसरी पारी में अब वह हर किसी के निशाने पर हैं। शुक्रवार को उन्होंने कैबिनेट की मीटिंग के बाद दावा किया कि गृह मंत्री अनिल विज के साथ सारे विवाद खत्म हो गए। विज ने भी पत्रकारों से बातचीत में अपने मन की बात रखते हुए कहा कि सीएम उनके अच्छे दोस्त है। भाजपा खेमा इस शांति का अभी अच्छे से आनंद ले भी नहीं पाया था कि शाम होते होते एक और धमका हो गया। इस बार मोर्चा खोला भाजपा से बागी होकर महम से आजाद प्रत्याशी का चुनाव लड़ कर जीतने वाले विधायक बलराज कुंडू ने। उन्होंने सीएम मनोहर लाल के अति विश्वासपाऋ रोहतक के पूर्व विधायक मनीष ग्रोवर पर आरोपों की बौछार कर दी। उन्होंने समर्थन वापस लेने की धमकी दे डाली है। ध्यान रहे कूंड सरकार को बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं। यह आरोप उस वक्त लगे जब सीएम हालात को सामान्य करने में लगे हुए हैं। ऐसे में एक बार फिर से सीएम और उनके रणनीतिकारों की सांस फूल रही है।
इसलिए कुंडू के आरोपों से परेशान हो रही भाजपा
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| बलराज कुंडू ने भाजपा से बगावत कर महम विधानसभा से चुनाव लड़ा था। वह इलाके माजिक कार्यकर्ता के तौर पर जाने जाते हैं। अच्छी खासी पकड़ उनकी यहां के लोगों के बीच हैं। काफी लंबे समय से वह सामाजिक कार्यों में लगे हुए हैं। |
विधायक ने मनीष ग्रोवर के माध्मय से एक तरह से सीएम पर हमला किया है। मनोहर लाल अपनी छवि को लेकर खासे संवेदनशील रहते हैं। अभी तक के कार्यकाल में उन पर कम से कम भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है। लेकिन इस बार जिस तरह से उन पर आरोप लग रहे हैं, इसके छींटे उनकी छवि पर पड़ते नजर आ रहे हैं। दूसरी बार सीएम पद संभालने के बाद मनोहर लाल के सामने इस बार असली चुनौती तो पार्टी को समर्थन दे रहे विधायकों को शांत रखने की है। जिसमें वह अभी तक असफल साबित होते नजर आ रहे हैं। हरियाणा का विपक्ष अभी तक ज्यादा सक्रिय नहीं है। फिर भी सरकार के साथी विधायक जिस तरह से उंगली उठा रहे हैं, इससे कहीं न कहीं जनता के बीच यहीं संदेश जाता है कि सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
कुंडू का समर्थन वापसी तो मायने नहीं रखती, लेकिन आरोप गंभीर हैं
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फिलहाल मनोहर सरकार को कोई खतरा तो नहीं है। फिर भी जिस तरह से बयानबाजी हो रही है, इससे उनकी छवि पर असर पड़ रहा है। जो आने वाले समय में सियासी तौर पर नुकसानदायक साबित हो सकता है
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जाने माने राजनीतिक समीक्षक विकास कुमार ने बताया कि आजाद विधायक यदि समर्थन वापस लें भी लेते हैं तो इससे सरकार को ज्यादा फर्क पकड़ने वाला नहीं है।विधानसभा में सरकार के लिए 46 सीट चाहिए थी, भाजपा की 40 सीट जेजेपी की दस सीट मिल कर बहुमत से आगे निकल जाती है। इसलिए कुंडू की समर्थन वापसी के बयान के ज्यादा मायने नहीं है। इस वक्त प्रदेश में कांग्रेस के 31 विधायक है। सात आजाद जीत कर आए। राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि इस वक्त सियासी समीकरण भाजपा के पक्ष में है। यह तब तक रहेगा जब तक कि जेजेपी में बहुत बड़ा धमाका नहीं हो जाता। जो फिलहाल तो संभव होता नजर नहीं आ रहा हैं। लेकिन जिस तरह से इस बार सीएम पर निशाना साधा जा रहा है, इससे कहीं न कहीं यह संदेश जा रहा है कि वह कमजोर है। ऐसे में पार्टी के भीतर और बाहर बगावत होने के चांस बढ़ जाते हैं। यूं भी जो आरोप लग रहे हैं, वह भ्रष्टाचार से जुड़े हुए हैं। इससे विपक्ष को भी बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल जाता है। इसके दूरगामी परिणाम भी निकल सकते हैं। क्योंकि विपक्ष यदि इस तरह के आरोप लगाए तो इन्हें खारिज भी किया जा सकता है, लेकिन जब साथ विधायक ही सवाल खड़ा करें तो इसे जनता के बीच खारिज करना भी भाजपा के लिए मुश्किल हो सकता है।
विवाद है कि मनोहर सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं
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- पिछले कार्यकाल के दौरान यहीं माना जाता रहा है कि मनोहर लाल की पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में अच्छी पकड़ है। पीएम नरेंद्र मोदी उन्हें पसंद करते हैं, काफी नजदीकी है। यह भी एक वजह थी तब कोई मनोहर के खिलाफ चाह कर भी मुखर नहीं हो पाता था। इस बार हालात बदल गए। पार्टी कहां तो 74 पार का नारा दे रही थी, इधर बहुमत भी हासिल नहीं कर पायी। सीएम होने के नाते काफी हद तक मनोहर लाल को इसका जिम्मेदार माना गया। इससे वह पार्टी के भीतर कमजोर हुए हैं। अब पार्टी आला कमान भी उनकी हर बात नहीं मान रहा है।
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इस बार मनोहर लाल के लिए सभी को साध कर चलना खासा मुश्किल हो रहा है। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा कहते हैं कि मनोहर लाल को सरकार चलाने का अनुभव नहीं है। जाने माने राजनीतिक समीक्षक सतीश कुमार ने बताया कि पूर्व सीएम की इस बात में दम हैं। पिछले कार्यकाल में मनोहर लाल इसलिए ज्यादा असरकारक रहे क्योंकि उनके पीछे पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व मजबूती से खड़ा था। पिछली बार भी यदा कदा उनके विधायक आैर मंत्री मुखर तो होते रहे, लेकिन तब उनके तेवरों को पार्टी आलाकमान ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी। इस बार हालात बदल गए हैं। एक तो यह है कि भाजपा को अपने दम पर बहुमत नहीं मिल पाया। इसका ठिकरा प्रदेश भाजपा ने मनोहर लाल के सिर पर फोड़ दिया। दूसरा यह है कि केंद्रीय नेतृत्व में भी अब मनोहर लाल की पकड़ पहले वाली नहीं रही। अब यहीं माना जा रहा है कि वह प्रशासनिक तौर पर ज्यादा प्रभावी नहीं है। यह भी एक वजह रही कि विज को काफी हैवी मंत्रालय दिए गए हैं। ऐसे में कोई भी विवाद उठता है तो इससे सीएम का असहज होना स्वाभावित है। यहीं कारण है कि वह फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं।
विवाद जो बटोर रहे सियासी सुर्खियां
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जजपा के हिसार ज़िले के नारनौंद विधानसभा हलके से विधायक राम कुमार गौतम ने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद छोड़ने की घोषणा करके सभी को हैरान कर दिया था। उन्होंने अपने मुखिया व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला पर सवाल खड़ा किया।
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आईपीएस के तबादले पर होम मिनिस्टर अनिल विज ने उठाए सवाल। यह विवाद केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचा। कई दिन तक सुर्खिया बटोरने के बाद अब शुक्रवार को शांत होता हुआ दिखायी दे रहा है।
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आजाद विधायक बलराज कुंडू ने रोहतक के पूर्व विधायक पर आरोपों लगाते हुए समर्थन वापसी का बयान जारी कर दिया है। जिससे एक बार फिर से सरकार के रणनीतिकार असहज हो रहे हैं।
बड़ा सवाल बलराज नाराज क्यों?
यह स्वाभावित है कि इस मौके पर बलराज नाराज क्यों हैं। अभी एक दम से ऐसा क्या हुआ है। राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि जब तक सीएम कमजोर होता है तो हर कोई सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहता है। कुंडू जानते हैं कि सरकार पर वार करने का यह अच्छा मौका है। क्योंकि हर ओर से सीएम घिरे हुए है। ऐसे में शांत करने के नाम पर उन्हें सत्ता में कोई हिस्सेदारी मिल सकती है।